सुरक्षा बनाम सेवा, हरभजन सिंह ने नेताओं पर उठाए सवाल
चंडीगढ़ | क्रिकेट के मैदान से राजनीति की पिच पर उतरे हरभजन सिंह इन दिनों अपनी सुरक्षा को लेकर चर्चा के केंद्र में हैं। आम आदमी पार्टी के टिकट पर पंजाब से राज्यसभा पहुंचे हरभजन ने हाल ही में राघव चड्ढा के नेतृत्व में भाजपा का दामन थाम लिया, जिसके बाद पंजाब की भगवंत मान सरकार ने उन्हें दी गई 'Y' कैटेगरी की सुरक्षा वापस ले ली। राज्य सरकार के इस कदम के खिलाफ हरभजन सिंह ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनकी दलील है कि पार्टी छोड़ने के बाद जालंधर स्थित उनके आवास के बाहर हिंसक प्रदर्शन हुए और दीवारों पर उन्हें 'गद्दार' तक लिखा गया, जिससे उनके और उनके परिवार की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। हालांकि केंद्र सरकार ने उन्हें तत्काल सीआरपीएफ की सुरक्षा मुहैया करा दी है, लेकिन हरभजन का तर्क है कि स्थानीय स्तर पर सुरक्षा देना पंजाब पुलिस का दायित्व है। इस मामले में 30 अप्रैल को सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पंजाब सरकार को आदेश दिया है कि वह पूर्व क्रिकेटर और उनके परिवार की शारीरिक सुरक्षा सुनिश्चित करे।
सांसदों की जवाबदेही पर उठे सवाल: सुविधाओं और प्रदर्शन के बीच गहराता अंतर
हरभजन सिंह के सुरक्षा विवाद ने भारतीय राजनीति में राज्यसभा सांसदों के चयन और उनकी सक्रियता पर एक नई बहस छेड़ दी है। यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या राज्यसभा की सदस्यता केवल रसूख और सुरक्षा जैसी सुविधाएं प्राप्त करने का जरिया बन गई है। आंकड़ों की बात करें तो संसद में हरभजन सिंह की औसत उपस्थिति मात्र 28 प्रतिशत रही है, जो उनके विधायी कार्यों के प्रति समर्पण पर प्रश्नचिह्न लगाती है। इसी तरह के सवाल पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की सक्रियता पर भी उठते रहे हैं, जिन्होंने लंबी अवधि में न तो कोई सवाल पूछा और न ही किसी बहस में हिस्सा लिया। विशेषज्ञों का तर्क है कि जब जनता के टैक्स के पैसे से सांसदों की सुरक्षा पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, तो सदन में उनकी नगण्य उपस्थिति लोकतंत्र के साथ एक मजाक की तरह है। वर्तमान घटनाक्रम यह सोचने पर मजबूर करता है कि राजनीतिक दल किस योग्यता के आधार पर उच्च सदन के प्रतिनिधि चुनते हैं और क्या सुरक्षा कवच का इस्तेमाल विरोधियों को साधने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है।

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