मुंबई। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों और मध्य-पूर्व (मिडल-ईस्ट) के भू-राजनीतिक तनाव के कारण भारतीय मुद्रा (रुपये) पर लगातार दबाव बना हुआ है। इसके बावजूद, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) नीतिगत ब्याज दरों में समय से पहले या अचानक (ऑफ-साइकिल) बढ़ोतरी करने पर कोई विचार नहीं कर रहा है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, केंद्रीय बैंक रुपये की गिरावट को थामने के लिए ब्याज दरों को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के पक्ष में नहीं है। आरबीआई का पूरा ध्यान इस समय देश की आर्थिक वृद्धि (ग्रोथ) और महंगाई के बीच एक बेहतर संतुलन बनाने पर केंद्रित है।

महंगाई और आर्थिक विकास में संतुलन बनाने की नीति पर कायम

आरबीआई के आंतरिक सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय बैंक के भीतर फिलहाल ऐसा कोई माहौल या संकेत नहीं हैं जो यह दर्शाए कि वह मुद्रा बाजार की अस्थिरता को रोकने के लिए अपनी मौद्रिक नीतियों में अचानक कोई कड़ा बदलाव करेगा। रिजर्व बैंक अपने 'लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचे' (फ्लेक्सिबल इन्फ्लेशन-टारगेटिंग फ्रेमवर्क) पर मजबूती से कायम है। इस नीति के तहत कोई भी फैसला लेते समय रिटेल महंगाई को काबू में रखने के साथ-साथ देश की आर्थिक तरक्की की रफ्तार को बनाए रखने पर समान रूप से जोर दिया जाता है।

नियंत्रण के भीतर है खुदरा महंगाई दर

राहत की बात यह है कि देश की खुदरा (रिटेल) महंगाई दर अभी भी रिजर्व बैंक द्वारा तय की गई सुरक्षित सीमा के भीतर बनी हुई है। आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल महीने में खुदरा महंगाई दर 3.48 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इसके अलावा, वित्तीय वर्ष 2027 के लिए आरबीआई ने महंगाई का जो 4.6 प्रतिशत का अनुमान लगाया है, वह भी तय दायरे के भीतर ही आता है। ऐसे में केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों में आपातकालीन बदलाव करने की कोई जल्दबाजी नहीं है।

कच्चा तेल $95 प्रति बैरल होने पर भी 6.7% की रफ्तार से बढ़ेगी इकोनॉमी

सूत्रों ने केंद्रीय बैंक की मॉनीटरी पॉलिसी रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि आने वाले वित्तीय वर्ष 2028 में अनुकूल आधार प्रभाव (बेस इफेक्ट) के चलते खुदरा महंगाई में और कमी देखने को मिल सकती है। रिपोर्ट के अनुमानों के मुताबिक, यदि आने वाले समय में कच्चे तेल की औसत कीमत बढ़कर 95 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच जाती है, तब भी देश की औसत खुदरा महंगाई 5 प्रतिशत के आसपास ही रहेगी। वहीं, भारत की आर्थिक विकास दर (ग्रोथ रेट) के 6.7 प्रतिशत के मजबूत स्तर पर बने रहने की पूरी संभावना है।

5 जून को होने वाली नीतिगत समीक्षा पर टिकीं बाजार की निगाहें

हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी स्पष्ट किया था कि केंद्रीय बैंक अपनी नीतियां तैयार करते समय आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई साइड) में आने वाले अस्थायी व्यवधानों के शुरुआती असर को नजरअंदाज करेगा। हालांकि, इससे पहले कुछ विदेशी रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि आरबीआई रुपये को संभालने के लिए ब्याज दर बढ़ाने और डॉलर जुटाने जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है, लेकिन वर्तमान रुख इन दावों के विपरीत है। अब सभी की नजरें 5 जून को होने वाली आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति समीक्षा पर टिकी हैं। ज्ञात हो कि आरबीआई ने आखिरी बार मई 2022 में तय समय से हटकर (ऑफ-साइकिल) ब्याज दरें बढ़ाई थीं।