सबरीमाला विवाद: व्यक्तिगत आस्था बनाम संवैधानिक नैतिकता, न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र पर नजर
नई दिल्ली: सबरीमाला मंदिर विवाद से जुड़े संवैधानिक सवालों पर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच के समक्ष शुक्रवार को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि क्या न्यायपालिका को यह तय करने का अधिकार है कि किसी धर्म के लिए कौन सी प्रथा अनिवार्य है और कौन सी नहीं।
वरिष्ठ वकीलों के तर्क
वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने दलील दी कि भारत में आस्था और रीति-रिवाज संप्रदायों पर निर्भर करते हैं। उन्होंने अदालतों द्वारा धर्म के 'अभिन्न हिस्से' को तय करने वाले टेस्ट का विरोध करते हुए कहा कि यदि हर धार्मिक प्रथा को विज्ञान की कसौटी पर परखा गया, तो धर्म का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। उन्होंने जोर दिया कि बदलाव समाज के भीतर से आना चाहिए, न कि केवल कानून से।
वहीं, अय्यप्पा भक्त संघ की ओर से वरिष्ठ वकील वी. गिरी ने कहा कि अदालती हस्तक्षेप से सदियों पुरानी परंपराएं प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने तर्क दिया कि सबरीमाला में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का प्रवेश वर्जित होना भगवान अय्यप्पा के 'नैष्ठिक ब्रह्मचारी' स्वरूप पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आर्टिकल 25 के तहत व्यक्तिगत आस्था में तब तक दखल नहीं देना चाहिए जब तक वह सार्वजनिक स्वास्थ्य या नैतिकता को नुकसान न पहुँचाए।

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