मंदिर में दर्शनों के बाद इसलिए कुछ समय बैठने की है मान्यता
मंदिर में दर्शनों के बाद कुछ समय सीढ़ी बैठने की परंपरा रही है। मान्यता है कि जब भी हम किसी मंदिर में दर्शन करते हैं, तो बाहर आकर थोड़ी देर सीड़ी पर बैठकर भगवान का ध्यान करना चाहिए। मंदिर की सीढ़ी पर बैठते ही एक विशेष श्लोक अनायासेन मरणम्, बिना देन्येन जीवनम्। देहान्त तव सानिध्यम्, देहि में परमेश्वरम्। का पाठ करना चाहिए।
इस श्लोक में यह संदेश है कि हमें सांसारिक वस्तुओं के लिए याचना नहीं करनी चाहिए। घर, धन, नौकरी, पुत्र-पुत्री जैसी चीजें भगवान अपनी कृपा से देते हैं। प्रार्थना का मतलब निवेदन और विशेष अनुरोध है, जबकि याचना सांसारिक इच्छाओं के लिए होती है।
दर्शन करते समय आंखें खुली रखनी चाहिए और भगवान के स्वरूप, चरण, मुखारविंद और श्रृंगार का पूरा आनंद लेना चाहिए। आंखें बंद करना गलत है, क्योंकि हम दर्शन करने आए हैं। लेकिन बाहर आने के बाद, आंखें बंद करके भगवान का ध्यान करना चाहिए।
यदि ध्यान करते समय भगवान का स्वरूप ध्यान में नहीं आता, तो फिर से मंदिर जाकर दर्शन करें और फिर सीड़ी पर बैठकर ध्यान और श्लोक का पाठ करें। यह प्रथा हमारे शास्त्रों और बुजुर्गों की परंपरा में बताई गई है।
इसका उद्देश्य हमारे जीवन में स्वास्थ्य, लंबी उम्र और मानसिक शांति सुनिश्चित करना है। मंदिर में नेत्र खुले और बाहर बैठकर नेत्र बंद करके ध्यान करना हमारी श्रद्धा, ध्यान और भक्ति का प्रतीक है।

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