25 साल पुरानी गड़बड़ी को खत्म करने के लिए चुनाव आयोग ने उठाया बड़ा कदम
मतदाता फोटो पहचान पत्र (ईपिक) नंबरों में पिछले 25 सालों से चली आ रही गडबड़ी अगले तीन महीने में दुरुस्त हो जाएगी। जल्द ही इसे लेकर संबंधित राज्यों में अभियान शुरू होगा। चुनाव आयोग ने शुक्रवार को इसे लेकर अहम घोषणा की है।
चुनाव आयोग ने कही ये बात
चुनाव आयोग ने कहा कि राज्यों में एक जैसे ईपिक नंबरों का यह आवंटन वर्ष 2000 में किया गया था। हालांकि इससे न तो किसी भी मतदाता की भौगोलिक पहचान प्रभावित होती है और न ही इसका मतलब यह है कि ये सभी फर्जी मतदाता हैं।
ईपिक नंबर के बावजूद मतदाता केवल उसी मतदान केंद्र पर वोट दे सकता है जिस मतदान केंद्र की मतदाता सूची में उसका नाम है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से हाल ही में इस मुद्दे को उठाए के बाद चुनाव आयोग ने तुरंत ही इसे लेकर सारी स्थिति साफ की थी। बताया था कि यह सिर्फ राज्यों की चूक है, जिन्होंने एक दूसरे मिलते-जुलते नंबरों की सीरीज आवंटित कर दी।
ईपिक नंबर के आवंटन की कोई केंद्रीकृत व्यवस्था नहीं
आयोग के मुताबिक अब तक यह मुद्दा इसलिए सामने नहीं आया, क्योंकि ईपिक नंबर के आवंटन की कोई केंद्रीकृत व्यवस्था नहीं थी। हाल ही में जैसे ही ईपिक नंबरों को एक केंद्रीकृत प्लेटफार्म से जोड़ा गया, तो यह मामला सामने आया।
आयोग ने शुक्रवार को राज्यों को दिए गए निर्देश में कहा है कि वे जल्द ही एक समान ईपिक वाले नंबरों को जांच कर सामने लाएं। ऐसे नंबरों को जगह जल्द ही विशिष्ट ईपिक नंबर आवंटित किए जाएंगे। गौरतलब है कि बंगाल, गुजरात, हरियाणा और राजस्थान के कुछ जिलों में एक जैसे ईपिक नंबर की गड़बड़ी है।
नई प्रणाली भविष्य के मतदाताओं के लिए भी लागू होगी
चुनाव आयोग ने तकनीकी टीमों और संबंधित राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के साथ विस्तृत चर्चा के बाद अगले तीन महीनों में इस मुद्दे को सुलझाने का फैसला किया है। नई प्रणाली भविष्य के मतदाताओं के लिए भी लागू होगी।

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