कभी 25 रुपए महीने कमाते थे ओम प्रकाश, फ़िल्मी दुनिया में हुए सुपरहिट !

ओम प्रकाश की विरासत मिमिक्री में निकाली जाने वाली कुछ आवाजों और उनकी बड़े ही परिष्कृत अभिनय की बेजां उपेक्षा करते हुए उसे सिर्फ use and throw कॉमेडी के कोष्ठक में बंद कर देने जितने दायरे में ही बांध दी गई. जबकि उनका अभिनय बहुत फैलाव वाला था. सटीक था. किसी भी सीन में अपने किरदार को कुछ ही सेकेंड में वे स्थापित कर देते थे. किसी इमोशन को प्रकट करने के लिए वे बेहद कम समय लेते थे और वो इमोशन बहुत अधिक सघनता वाला होता था. अगर उनके अभिनय और तब के सुपरस्टार एक्टर्स के अभिनय को लिया जाए तो वे हमेशा आगे खड़े होते थे. ये स्थिति न भी रही फिर भी वे स्टार हीरोज़ के आगे चरित्र भूमिकाओं में भी भारी रहते थे.

‘नमक हलाल’ फिल्म में अमिताभ के साथ उनका सीन ले लीजिए जिसमें द्ददू बने ओम प्रकाश उन्हें बड़े की तरह बिहेव करना सिखा रहे हैं.या फिर ‘पूरब और पश्चिम’ में वो सीन जहां वे विदेशी मुल्क में अपने दामाद को वापस ले जाने आए हैं और धोती-कपड़े फटेहाल हो रहे हैं, जहां वे दुत्कारे जा रहे हैं और फिरंगी युवती के आगे पगड़ी बिछा रहे हैं कि वो उससे उसकी बेटी का पति लौटा दे, जहां दामाद पीटकर जा रहा है और वो कह रहे हैं और मारो, मार डालो मुझे. इन दृश्यों में उनके सामने मनोज कुमार थे,‘बुड्ढा मिल गया’ और ‘चुपके चुपके’ जैसी फिल्मों में वे कहानियों के केंद्र में खूंटा गाड़े हुए थे. ‘गोपी’ में दिलीप कुमार के बड़े भाई गिरधारी के रोल में देखें. ‘शराबी’ में अमिताभ बच्चन के सामने मुंशीजी के रोल में देखें. हर फिल्म में वे जरूर याद रहते हैं.

ऐसी फिल्मों की सूची बहुत लंबी है फिर भी आखिरी तसल्ली करनी हो तो 1960 में रिलीज हुई ब्लैक एंड वाइट ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ का वो शुरुआती दृश्य देख सकते हैं जहां गिरधारी नाम के रोगी बने ओम प्रकाश अस्पताल में लेटे हैं. कैंसर है और ऑपरेशन होने वाला है. बचने की संभावना नहीं है. नर्स करुणा (मीना कुमारी) उसे थियेटर में ले जाने के लिए तैयार कर रही है और उस लंबे सीन को हंसी और दुख के दो एक्ट्रीम में जैसे ओम बांधते हैं कि हम कौतुहल से देखते रह जाते हैं. सरलता यहां भी प्रमुख रूप से बनी रहती है.

अपनी फिल्मों में ओम जी जितने मक्खन जैसे गालों वाले और नरम दिखते थे, उनकी असल कहानी उतनी ही नाटकीय, ठोकरों भरी और उतार-चढ़ाव वाली थी. वे 19 दिसंबर 1919 को लाहौर में पैदा हुए थे. रईस परिवार से थे. बचपन में कभी किसी चीज की दिक्कत नहीं थी. लाहौर और जम्मू में बहुत जमीनें थीं. पैसा उनके लिए कभी मसला नहीं रहा. जो चाहा वो मिला. स्कूल में एक स्तर के बाद मन नहीं लगा तो छोड़ दी. बंबई चले गए एक्टर बनने. ये 1933 की बात है जब वो सिर्फ 14 साल के थे. वहां सरोज फिल्म कंपनी में तीस रुपये महीना में काम करने लगे. लेकिन एक्टिंग का मौका मिल ही नहीं रहा था. ऊपर से बरसात ने फिल्म की शूटिंग रोक रखी. तो ये सपना एक बार वहीं बंद हो गया. घर लौट गए.

ओम जी की एक खास बात थी कि वो जिद्दी बहुत थे. चाहे जान जा रही हो, उन्हें इज्जत बहुत प्यारी थी. और अपने मन के फैसले बहुत प्यारे थे. बाद के वर्षों में उन्होंने बहुत कुछ ऐसा किया जिससे आप ये मान जाएंगे लेकिन तब शुरू में इसी से दिख गया कि वे घर लौटे तो स्कूल में रुचि फिर भी नहीं ली. तीन साल मजे किए. जम्मू में छुटि्टयां मना रहे थे कि तय किया बिजनेस शुरू करेंगे. लाहौर चले गए. एक लॉन्ड्री और ड्राई क्लीनिंग की दुकान खरीद ली, वो भी 16,000 रुपये की भारी भरकम कीमत पर. लेकिन मन तो लगना नहीं था तो ऊब कर इसे 7,000 रुपये में बेच दिया. इसके एक-दो साल बाद उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में काम शुरू कर दिया. दोस्तों ओम प्रकाश ने खुद अपनी जीवनी के बारे बताया की,यही वो वक्त था जब एक रॉयल फैमिली की सिख लड़की से मेरा रोमांस शुरू हो गया था.

हर रोज़ अपना प्रोग्राम खत्म करने के बाद मैं उससे एक पान की दुकान पर मिलता था और फिर हम दोनों वॉक पर जाते थे. हम दोनों प्यार करने लगे थे और मैं उससे शादी करना चाहता था. मेरे बड़े भाई ने शादी करने से मना कर दिया था तो मां ने मुझसे कहा कि तुम ही कर लो. गुजरने से पहले वो अपने किसी एक बेटे को तो शादीशुदा देखना चाहती थी. तब मुझमें हिम्मत नहीं थी कि अपने रोमांस के बारे में उनको बताता. लेकिन मैं ये भी जानता था कि अगर उनको इसका पता चलता तो वो इस लड़की से मेरी शादी पर आपत्ति नहीं करतीं जिसको मैं प्यार करता था. उस लड़की के घरवाले मेरे बड़े खिलाफ थे क्योंकि मैं हिंदू था.

एक दिन मैं पान की दुकान पर खड़ा था कि एक महिला मेरे पास आईं. वे बोलीं कि विधवा हैं और उनके चार बेटियां हैं जिनमें सबसे बड़ी 16 साल की है. वो मुझे दामाद बनाना चाहती थीं और ये भी कहा कि एक बार उनकी पहली बेटी की शादी हो जाए तो बाकियों की भी कर सकेंगी. उन्होंने इस बारे में मेरी मां से भी बात कर ली थी और मां कह चुकी थीं कि कोई दिक्कत की बात नहीं. उन्होंने मेरे आगे अपना पल्लू फैलाया और विनती की कि मैं मान जाऊं.

मैं भावुक हो गया था और उनके कहे मुताबिक तुरंत हां कर दी. अगले दिन मैं उस लड़की से मिला और उसे बताया कि क्या हुआ. मैंने उससे कहा कि अब यही ठीक होगा क्योंकि वैसे भी उसका परिवार मेरे बिलकुल खिलाफ था. जैसे ही उसने ये सुना वो दोनों हाथों से सिर पकड़कर फुटपाथ पर बैठ गई. कुछ देर बाद वो अपने घर चली गई. लेकिन वो मेरी शादी में भी आई. आज वो दादी बन चुकी है और अपनी शादीशुदा जिंदगी में खुश है.

मेरी धर्मपत्नी अमृतसर में रहती थी और मैं लाहौर में था. एक दिन मैंने अपने भाई से कहा कि वो जाए और अपनी भाभी को ले आए. वहां उसने मेरी पत्नी की बहन को देखा और उसके प्रेम में पड़ गया. मैंने अपने पिताजी को ये बताया और जल्द ही उन दोनों की शादी कर दी गई. उधर रेडियो स्टेशन पर मैं डायलॉग बोलने के अपने उस्ताद सैय्यद इम्तियाज अली से मिला. वो शानदार लेखक थे. उन्होंने ही नाटक ‘अनारकली’ (1922) लिखा था. फिर मैंने ऑल इंडिया रेडियो से इस्तीफा दे दिया क्योंकि वो मुझे सिर्फ 40 रुपये की तनख़्वाह दे रहे थे जबकि उस टाइम में चपरासियों को इससे ज्यादा मिल रहा था. लेकिन फिर भी मैं प्रेम-भाइचारे के साथ उनसे अलग हुआ.

Source: Bharatjai

 

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